South Indian sultanates: Bahmani State

दिल्ली सल्तनत के खंडहरों पर जितने भी स्वतंत्र मुस्लिम राज्य खड़े हुए, उनमें दक्कन का बहमनी राज्य सबसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। यह मुहम्मद बिन तुगलक के राज्यकाल में उसकी प्रभुता के विरुद्ध चुनौती के रूप में स्थापित हुआ। दक्कन के सरदार दिल्ली के सुल्तान की सनकी नीति से विद्रोही बन बैठे। उन्होंने दौलताबाद के किले पर अधिकार कर अपने में से एक इस्माइल मुख अफगान को नसिरुद्दीन शाह के नाम से दक्कन का राजा घोषित कर दिया। इस्माइल मुख बूढ़ा और आरामतलब होने के कारण इस पद के अयोग्य सिद्ध हुआ। शीघ्र ही वह स्वेच्छा से एक अधिक योग्य नेता हसन के, जिसे जफर खाँ की उपाधि प्राप्त थी, पक्ष में गद्दी से हट गया। जफर खाँ को सरदारों ने 3 अगस्त, 1347 ई. को अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सुल्तान घोषित किया। फरिश्ता हसन की उत्पत्ति के विषय में एक कहानी कहता है कि वह मूल रूप में दिल्ली के गंगू नाम एक ब्राह्मण ज्योतिषी का, जो मुहम्मद बिन तुगलक का प्रिय पात्र था, घरेलू नौकर था तथा आगे चलकर अपने हिन्दू स्वामी की सहायता से प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ। उत्तरकालीन मुस्लिम इतिहासकारों के विवरणों से अथवा सिक्कों या अभिलेखों के प्रमाण से इस कहानी का पुष्टिकरण नहीं होता। वास्तव में हसन प्रसिद्ध फारसी वीर बहमन, जो इस्फन्दियार का पुत्र था, का वंशज होने का दावा करता था और इस प्रकार उसके द्वारा स्थापित वंश का नाम बहमनी वंश पड़ा। बहमन शाह को खलीफा से भी मान्यता प्राप्त थी। उसके सिक्के पर द्वितीय सिकन्दर खुदा हुआ था।
गद्दी पर बैठने के शीघ्र बाद अलाउद्दीन हसन ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी के लिए चुना तथा उसका नाम बदल कर अहसनाबाद कर दिया। पर दक्षिण के हिन्दू शासक, जो अलाउद्दीन हसन के उदय के समय की दक्कन में हुई राजनैतिक अव्यवस्था से लाभ उठाने में नहीं चूके थे, उसकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। अत: उसने विजय की नीति का अनुसरण किया, जो सफल रही। 11 फरवरी, 1358 ई. को उसकी मृत्यु हुई। उस समय उसका राज्य उत्तर में वेन गंगा नदी से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक तथा पश्चिम में दौलताबाद से लेकर पूर्व में भोंगीर तक फैला था। अपने राज्य के शासन के लिए उसने इसे चार भागों अथवा प्रान्तों में विभाजित कर दिया- गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर। प्रत्येक प्रान्त एक शासक के अधीन था, जो अपनी सेना रखता था तथा अपने अधीन सभी नागरिक और सैनिक पदों पर नियुक्तियाँ करता था। प्रान्तों में शासन की कार्यक्षमता के कारण विद्रोहों का होना रुक गया। बुरहाने-मआसिर के लेखक ने इस सुल्तान की प्रशंसा इस प्रकार की है- सुल्तान अलाउद्दीन प्रथम हसन शाह एक न्यायी राजा था। वह अपनी प्रजा को दिल में रखने वाला एवं धर्मनिष्ठ था। उसके शासन-काल में उसकी प्रजा एवं सेना अपना समय पूरे चैन और सन्तोष में व्यतीत किया करती थी। सच्चे धर्म का प्रचार करने के लिए उसने बहुत कुछ किया।
अगले सुल्तान हसन का ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद शाह प्रथम था। हसन ने अपनी मृत्युशैय्या पर उसे अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया था। गद्दी पर बैठने के शीघ्र बाद मुहम्मद शाह ने अपनी सरकार की विभिन्न शाखाओं- जैसे मंत्रिमंडल, घरेलू सेना तथा प्रान्तीय शासन का संगठन किया। पर अपने सारे शासनकाल में वह मुख्यतया वारंगल एवं विजयनगर के शासकों के साथ युद्ध करने में लगा रहा। उन शासकों ने भयंकर प्रतिरोध किया, पर दोनो को गुलबर्गा की सेना से पराजित होकर तथा महान् क्षति उठाकर अपमानजनक शताँ पर संधि करनी पड़ी। मुदकल के किले पर हुए इस युद्ध में पहली बार बारूद का प्रयोग हुआ था।
मुहम्मद शाह का रहने का ढंग दोषारोपण से परे नहीं था। बुरहाने-मआसिर का लेखक स्पष्ट रूप से लिखता है कि- सुल्तान रहन-सहन के अधार्मिक ढंग प्रदर्शित करता था, जिससे वह असहाय अवस्था में पड़ जाता था।
1377 ई. में मुहम्मद शाह प्रथम की मृत्यु हुई। उसके बाद उसका पुत्र मुजाहिद शाह गद्दी पर बैठा तथा स्वयं सेना लेकर विजयनगर के विरुद्ध बढ़ा। पर वह उस नगर पर अधिकार नहीं कर सका और उसे शीघ्र उसके राय के साथ संधि कर अपनी राजधानी लौट आना पड़ा। वह दाऊद खाँ नामक अपने एक निकट सम्बन्धी द्वारा संगठित षड्यंत्र का शिकार बन गया। दाऊद खाँ ने गद्दी हड़प ली। मुजाहिद की दूध-बहन (धात्री-पुत्री) रूह परवर आगा के उकसाने से एक हत्यारे ने उस हड़पने वाले को मई, 1378 ई. में हत्या कर उसक बदला चुका दिया। तब सरदारों एवं सैनिक अधिकारियों ने अलाउद्दीन हसन बहमनी के चतुर्थ पुत्र महमूद खौं के लड्के मुहम्मद शाह को गद्दी पर बैठाया।
अपने पूर्वगामियों से भिन्न मुहम्मद शाह द्वितीय शान्तिप्रिय एवं विद्याव्यसनी था। उसके राज्यकाल में बाहरी शक्तियों से लड़ाइयाँ नहीं लड़ी गयीं। उसने मस्जिदों का निर्माण करवाया, अनाथों के लिए नि:शुल्क पाठशालाएँ स्थापित कीं तथा एशिया के सभी भागों से विद्वानों को अपने दरबार में आमंत्रित किया। पर उसके अन्तिम दिन उसके पुत्रों के, जो गद्दी प्राप्त करने की इच्छुक थे, षड्यंत्रों के कारण विषादमय बन गये। अप्रैल, 1397 ई. में उसकी मृत्यु हुई। इसके बाद ग्यासुद्दीन एवं शम्सुद्दीन नामक उसके दोनों पुत्रों के गौरवहीन एवं दु:खदायी राज्यकाल आये, जो कुछ ही महीनों तक रहे। नवम्बर, 1397 ई. में गुलबर्गा के सिंहासन पर अलाउद्दीन हसन बहमनी के पौत्र फीरोज ने अधिकार कर ताजुद्दीन फीरोज शाह की उपाधि धारण की।
बुरहाने-मआसिर का लेखक हमें बतलाता है कि फीरोज शाह प्रबल एवं पराक्रमी सुल्तान था। उसने अपनी सारी योग्यता एवं स्फूर्ति को अत्याचार और पाखंड के उन्मूलन एवं विनाश में लगाया। उसे शेखों, विद्वानों एवं साधुओं के समाज में बड़ा आनन्द आता था। पर कुछ वर्षों के शासन के बाद वह उस समय के प्रचलित पापों में निरत हो गया, जिसका उल्लेख फरिश्ता तक ने किया है। वह विभिन्न भाषाएँ जानता था तथा अपनी भिन्न-भिन्न जातियों की पत्नियों से उनकी अपनी भाषाओं में ही स्वच्छन्द रूप से बातें कर सकता था। उसने खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए, दौलताबाद में एक वेधशाला (वद्देमतअंजवतल) का निर्माण कराया। विजयनगर के रायों तथा दक्कन के कुछ अन्य हिन्दू शासकों के विरुद्ध युद्ध कर उसने अपने वंश की परम्परागत नीति का अनुसरण किया। विजयनगर के विरुद्ध 1398 ई. एवं 1406 ई. के अपने दोनों आक्रमणों में उसे सफलता मिली। उसने इसके राजा से भारी हर्जाना वसूल किया और यहाँ तक कि अपने अन्त:पुर के लिए उसे विजयनगर की एक राजकुमारी समर्पित करने को भी विवश किया। पर 1420 ई. के अपने तीसरे आक्रमण के फलस्वरूप कृष्णा के उत्तर पांगुल में उसकी हार हो गयी तथा अपने प्रधान सेनापति मीर फज़लुल्लाह इंमजू के मारे जाने पर उसे मैदान से पीछे हटना पड़ा। विजयनगर की सेना ने शीघ्र बहमनी राज्य के दक्षिणी एवं पूर्वी जिलों पर अधिकार कर लिया। इस पराजय का सुल्तान के मन एवं शरीर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। उसने शासन अपने दासों-हुशिवार ऐनुलमुल्क एवं निजाम बीदारुलमुल्क-के हाथों में सुपुर्द कर दिया। अन्त में वह अपने भाई अहमद के पक्ष में गद्दी छोड़ने को विवश किया गया। बुरहाने-मआसिर के लेखक के कथनानुसार, अहमद ने सितम्बर, 1422 ई. में फीरोजशाह से छुट्टी पा ली, यद्यपि फरिश्ता के प्रमाण पर कुछ लेखकों का विश्वास है कि फीरोज शाह की मृत्यु स्वाभाविक रूप में हुई।
अपने भाई के राज्यकाल में हुई बहमनी सेना की क्षति का बदला लेने के अभिप्राय से अहमद ने विजयनगर से भयंकर युद्ध किया। बहमनी सेना ने विजयनगर पर घेरा डालकर इसे बड़ा कष्ट पहुँचाया तथा इसके राजा को भारी हर्जाना देकर संधि करने को विवश किया। यह खबर राय के पुत्र द्वारा हाथियों पर अहमद के खेमे में पहुँचायी गयी। राजा के पुत्र का वहाँ सम्मान सहित स्वागत हुआ। तब आक्रमणकारी अपने देश को लौट गये। 1424 अथवा 1425 ई. में अहमद शाह के सेनापति खाने-आजम ने वारंगल के हिन्दू राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा विशाल धनराशि सहित इसके गढ़ पर अधिकार करने और इसके राजा की हत्या करने में सफल हुआ। इस प्रकार वारंगल की स्वतंत्रता नष्ट हो गयी। अहमद शाह ने मालवा के विरुद्ध भी युद्ध किया। मालवा का सुल्तान हुशंग शाह पराजित हुआ तथा उसे धन-जन की अपार क्षति हुई। अहमद गुजरात के सुल्तान अहमदशाह प्रथम के साथ युद्ध में असफल रहा तथा अन्त में उभय पक्षों के धर्म-ज्ञानियों एवं विद्वानों की मध्यस्थता से संधि हो गयी। उसके शासनकाल में कोंकण के हिन्दू नायकों ने भी बहमनी शस्त्रों के बोझ का अनुभव किया। पर फरवरी, 1435 ई. में बीमारी के कारण उसकी मृत्यु हो जाने से यह दबाव जाता रहा। अहमदशाह अपने राज्य की राजधानी गुलबर्गा से बदलकर बीदर ले गया। बीदर रमणीक स्थान पर था तथा उसकी जलवायु स्वास्थकर थी। यद्यपि वह अधिक विद्या-सम्पन्न न था, पर उसने कुछ मुस्लिम विद्वानों पर मेहरबानी की बौछार की। खुरासान में स्थित इस्फरायीन का कवि शेख आजरी उसके दरबार में आया था। उसे, बीदर स्थित उसके राजमहल की प्रशंसा में दो पद्य रचने के लिए, प्रचुर धन मिला। मौलाना शफुद्दीन माजन्दरानी को भी उस राजमहल के द्वार पर दो पद्यों को सुन्दर लिखावट में अंकित करने के लिए 12000 टका इनाम में मिला सका। एक सूफी संत गेसूदराज से सम्पर्क था और इसी सम्पर्क के कारण उसे वली के नाम से भी जाना जाता था।
इसी बीच पद एवं प्रभाव के लिए सरदारों के षड्यन्त्रों के कारण, जिनमें प्राय: व्यवस्थित युद्ध एवं जन-संहार हुआ करते थे, वहमनी राज्य की एकजातीयता पर बुरा असर होने लगा था। सरदारों के दो दलों के बीच स्थायी कलह चलने लगी। एक ओर दक्कनी (दक्षिणी) सरदार थे, जिनके मित्र थे अफ्रिकन एवं मुवाल्लद (अफ्रिकन पिता एवं भारतीय माता से उत्पन्न सन्तान)। दूसरी और विदेशी सरदार थे, जिनमें तुर्क, अरब, फारसी एवं मुग़ल सम्मिलित थे। दूसरे दल के बहुत-से सरदारों को उनकी वीरतापूर्ण एवं क्रियाशील आदतों के कारण, राज्य में ऊँचे पद मिले तथा इस भूमि से उत्पन्न लोगों की अपेक्षा की गयी। फलत: ये विदेशी सरदारों से विद्वेष रखने लगे। यह विद्वेष धार्मिक विभिन्नता के कारण और भी बढ़ गया, क्योंकि अधिकांश दक्कनी सुन्नी थे, पर प्रतिद्वन्द्वी दल के अधिकतर लोग शिया थे। इस प्रकार उत्तरकालीन बहमनियों का इतिहास षड्यंत्रों एवं कलह की दुखद गाथा है। ये षड्यंत्र और कलह राज्य के अंत में क्षत-विक्षत होने तक उसका खून चूसते रहे।
अहमद के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र अलाउद्दीन द्वितीय के नाम से शान्तिपूर्वक गद्दी पर बैठने के शीघ्र बाद, अलाउद्दीन द्वितीय ने अपने भाई मुहम्मद के नेतृत्व में हुए एक विद्रोह का शमन किया। पर उसे क्षमाकर रायचूर दोआब की सरकार दे दी गयीं, जहाँ वह अपने शेष जीवन भर राजभक्त बनकर रहा। उसके बाद कोंकण के हिन्दू नायक अधीन किये गये तथा संगमेश्वर के राजा ने अपनी रूपवती पुत्री को बहमनी सुल्तान के साथ ब्याह दिया। यह सुल्तान की मुस्लिम पत्नी मलिका-ए-जहाँ को नहीं भाया। उसकी प्रार्थना पर उसके पिता नासिर खाँ ने, जो खानदेश का शासक था, बरार पर आक्रमण किया, पर दौलताबाद के सूबेदार एवं सरदारों के नेता मलिकुल तुज्जार खलफ हसन ने उसे परास्त कर दिया। 1443 ई. में अलाउद्दीन ने विजयनगर के विरुद्ध युद्ध किया। वहाँ के राय को भविष्य में नियमित रूप से कर देने की प्रतिज्ञा कर संधि करनी पड़ी। फरिश्ता लिखता है कि इस अवसर पर विजयनगर के राय ने अपनी सेना में मुस्लिम सैनिकों को नियुक्त किया, अपनी सेवा में कुछ मुस्लिमों को प्रविष्ट किया और यहाँ तक कि राजधानी में उनके पूजा करने के लिये एक मस्जिद भी बनवा दी। उस वंश के अन्य सुल्तानों की तरह अलाउद्दीन इस्लाम का उत्साही समर्थक तथा स्वधर्मावलम्बियों के प्रति उदार था। फरिश्ता एवं बुरहाने-मआसिर के लेखों से हम जानते हैं कि उसने मस्जिदों, सार्वजनिक विद्यालयों एवं दातव्य संस्थाओं की स्थापना की थी। इनमें एक अस्पताल भी था, जिसमें पूर्ण सुंदरता और शैली की शुद्धता थी। इसे उसने अपनी राजधानी बीदर में बनवाया था। उसने वहाँ दो सुन्दर गाँव धार्मिक दान के रूप में दिये थे, ताकि इन गाँवों के राजस्व को पूर्णत: दवाओं एवं पेय पदार्थों की आपूर्ति में लगाया जा सके...... .ईश्वरीय नियम के आदेशों एवं निषेधों को लागू करने में वह इतना प्रयत्नशील रहता था कि उसके अधिकार-क्षेत्र में मदिरा तथा सभी मादक द्रव्यों के नाम तक हटा दिये गये थे.......।
अलाउद्दीन की अप्रैल, 1457 ई. में शान्तिपूर्वक मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र हुमायूँ आया। वह इतना निष्ठुर था कि उसे जालिम का विशेषण मिला। बुरहाने-मआसिर के लेखक ने उसके निष्ठुरतापूर्ण कारनामों के उदाहरण दिये हैं। कुछ लेखकों के कथनानुसार, अक्टूबर, 1461 ई. में हुमायूँ की स्वाभाविक मृत्यु हो गयी। पर अधिक विश्वसनीय लेखक लिखते हैं कि जब वह नशे की हालत में था, तो उसके कुछ नौकरों ने उसकी हत्या कर डाली। उसकी मृत्यु ने उसकी प्रजा को उसकी यातना के चंगुल से मुक्त कर दिया।
प्राचीन इतिहास लेखकों के लेखानुसार हुमायूँ का नाबालिक पुत्र निजाम शाह उसके बाद गद्दी पर बैठाया गया। राजमाता मखदूमा जहाँ ने, ख्वाजा जहाँ एवं ख्वाजा महमूद गावान की सहायता से, राज्य-शासन का प्रबन्ध करने का प्रयत्न किया। पर इस कमसिन सुल्तान के शासनकाल में उडीसा एवं तेलगाना के राजा उसके राज्य पर आक्रमण करने को प्रोत्साहित हुए। उन्हें महान् क्षति के साथ वापस भगा दिया गया। पर शीघ्र ही बहमनियों के लिए एक अधिक भयानक खतरा उपस्थित हुआ। मालवा के महमूद खल्जी प्रथम ने उनके प्रदेशों पर आक्रमण कर दिया और बीदर पर घेरा डाल दिया। बहमनी के सुल्तान ने गुजरात के सुल्तान महमूद बैगरा से सहायता की अपील की। महमूद बैगरा ने इस अपील का अनुकूल उत्तर भेजा। तब जाकर कहीं बीदर की रक्षा हुई। 30 जुलाई, 1463 ई. को बिलकुल अचानक निजाम शाह की मृत्यु हो गयी। तब उसका भाई, जो केवल नौ वर्षों का था, मुहम्मद तृतीय के नाम से गद्दी पर बैठा।
मुहम्मद के सिंहासन पर बैठने के शीघ्र बाद वृद्ध मंत्री ख्वाजा जहाँ को, जिसका लक्ष्य राज्य में शक्ति का एकाधिकार स्थापित करना था, राजमाता के प्रभाव से मौत के घाट उतार डाला गया। रिक्त पद महमूद गावान को दिया गया। उसे ख्वाजा जहाँ (मलिक-ए-तुज्जार की भी) की उपाधि मिली। विशाल शक्तियों से सम्पन्न रहकर भी महमूद गावान ने कभी अपने अधिकार का दुरुपयोग नहीं किया। अपनी स्पष्ट योग्यता के द्वारा उसने अपरिमित राजभक्ति से बहमनियों के राज्य को ऐसे स्तर पर पहुँचा दिया, जहाँ यह पहले के सुल्तानों के समय कभी नहीं पहुँचा था।
1469 ई. में महमूद गावान सेना लेकर कोंकण के हिन्दू राजाओं को वश में करने चला। जब वह बहुत-से किलों पर अधिकार करने में सफल हो गया, तब संगमेश्वर के राजा ने भय से आतुर होकर अपने कारिन्दों को खेलना का गढ़ सौंप दिया। बुरहाने-महासिर का लेखक लिखता है कि- इस अद्वितीय मंत्री ने बहुत-से किलों एवं शहरों को जीता, विशाल धन लूटा तथा घोडे, हाथी, युवतियाँ और दासियाँ जैसी बहुमूल्य वस्तुएँ एवं कीमती जवाहरात और मोती उस मंत्री के हाथ लगे।
उसने गोआ को भी जीत लिया, जो विजयनगर साम्राज्य का एक सर्वश्रेष्ठ बन्दरगाह था। इस बीच बहमनी राज्य के एक सेनापति निजामुलमुल्क बहरी ने राजमहेंद्री एवं कोंडवीर के किले ले लिये। सन् 1474 ई. में लगातार दो वर्षों तक वर्षा नहीं होने के कारण हुए एक भयंकर दुर्भिक्ष ने दक्कन को उजाड़ डाला तथा बहुत-से मनुष्य इसके कष्ट से मर गये। जब अन्त में तीसरे वर्ष वर्षा हुई, तब देहात में खेत जोतने के लिए कोई कृषक नहीं बच रहा था।
परन्तु सुल्तान के सैनिक कार्य बिना कमी के जारी रहे। फरवरी, 1478 ई. में मुहम्मद ने उड़ीसा पर आक्रमण कर उसे उजाड़ डाला। वहाँ के राजा ने उसे कुछ हाथी तथा अन्य बहुमूल्य उपहार देकर लौट जाने को राजी किया।
उसके राज्यकाल का सबसे अधिक सफल सैनिक कार्य, विजयनगर के साथ एक युद्ध के सिलसिले में, कांची अथवा कांजीवरम् (12 मार्च, 1481 ई.) के विरुद्ध हुआ था। यहाँ कुछ पुराने मंदिर थे, जो युग के आश्चर्य थे तथा असंख्य दास कन्याओं के अतिरिक्त अनगिनत छिपे खजानों एवं जवाहरात और बहुमूल्य मुक्ताओं से परिपूर्ण थे। घिरे हुऐ सैनिकों ने वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया, पर अन्त में बहमनी की सेना ने उन्हें पराजित कर दिया तथा बहुत माल लूटा।
मुहम्मद शाह तृतीय के राज्यकाल का सैनिक ब्यौरा वस्तुत: विजय का ही है। पर उसकी अपनी विलासिता तथा उसके दरबार के सरदारों के स्वार्थपूर्ण षड्यंत्र अन्य क्षेत्रों में उसकी प्रगति के पथ के बाधक हो गये तथा अन्त में उसका नाश कार डाला। जैसे-जैसे समय बीतता गया, घोर मदिरापान में अत्यन्त निरत रहने के कारण, सुल्तान का मानसिक संतुलन जाता रहा। वह महमूद गावान के शत्रु दक्कनी सरदारों के बहकावे में आ गया। ये दक्कनी सरदार महमूद गावान की शक्ति एवं सफलता से जलते थे। सुल्तान को यह विश्वास दिलाने के लिए कि मंत्री (महमूद गावान) विजयनगर के राय के साथ राजद्रोहात्मक पत्र-व्यवहार कर रहा है, उन्होंने एक जाली पत्र पेश कर डाला। सुल्तान ने मंत्री को 5 अप्रैल, 1481 ई. को मृत्यु-दंड देकर एक आत्मघाती कदम उठाया। इस प्रकार महमूद गावान, जिसने कार्यक्षमता एवं ईमानदारी के साथ लगातार तीन शासनकालों में मंत्री के रूप में बहमनी राज्य की सेवा की थी जिसके लिए वह अपने स्वामी की कृतज्ञता का अधिकारी था, राज्य के सच्चे हितों से आँखें मूद लेने वाले प्रतिद्वन्द्वी सरदारों के दल द्वारा संगठित एक षड्यंत्र का शिकार बन गया। मेडोज टेलर ठीक ही लिखता है कि इस पुराने मंत्री की अन्यायपूर्ण फाँसी के साथ बहमनी राज्य की सारी सम्बद्धता तथा शक्ति विदा हो गई। कई तरह से महमूद गावान का चरित्र उसके समकालीनों के चरित्र से कहीं अधिक श्रेष्ठ था। वह सरल एवं पवित्र जीवन व्यतीत करता था। वह विद्या एवं विद्वानों की संगति का प्रेमी था। इस कारण उसने बीदर में एक शानदार कालेज एवं एक विशाल पुस्तकालय स्थापित किया था। एक सार्वजनिक पदाधिकारी के रूप में अपनी स्वार्थरहित सेवाओं के लिए वह उचित ही हम लोगों की प्रशंसा का अधिकारी है। मुहम्मद तृतीय को अपनी मूर्खता मालूम पड़ गयी, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दु:ख एवं पश्चाताप से ग्रस्त होकर एक वर्ष के अन्दर ही 22 मार्च, 1482 ई. को उसकी मृत्यु हो गयी।
इस समय से बहमनी राज्य में अत्यन्त गड़बड़ी फैल गयी, जिस कारण उसका पतन अनिवार्य हो गया। मुहम्मद तृतीय के छोटे पुत्र एवं उत्तराधिकारी महमूदशाह में न तो व्यक्तिगत चरित्र का बल ही था और न किसी योग्य मंत्री का मार्ग-प्रदर्शन ही था। जिससे वह अपने राज्य की समग्रता को सँभाल सकता। दक्कनियों एवं विदेशियों के बीच का झगड़ा पहले की प्रचंडता और तीक्ष्णता के साथ जारी रहा। प्रान्तीय शासकों ने इस फैली हुई गड़बड़ी से लाभ उठाकर स्वतंत्रता घोषित कर दी। महमूद की नाममात्र की प्रभुता राजधानी के आसपास एक छोटे क्षेत्र में संकुचित होकर रह गयी। वह तथा उसके चारों उत्तराधिकारी तुर्की जाति के एक चतुर सरदार कासिम बरीदुल ममालिक के तथा 1504 ई. में उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र अमीर अली बरीद (जिसे दक्कन की लोमड़ी कहा जाता है) के हाथों में कठपुतले-मात्र बने रहे। अन्तिम सुल्तान कलीमुल्लाह शाह ने अपने वंश के खोये हुए भाग्य को पुनः प्राप्त करने के लिए गुप्त रूप से बाबर की सहायता प्राप्त करने की कोशिश की, पर उसे दु:खपूर्ण निराशा हुई। 1527 ई. में उसकी मृत्यु के साथ बहमनी वंश का, लगभग एक सौ अस्सी वर्षों के शासन के बाद, अन्त हो गया।
सामान्यत: दक्कन के बहमनी वंश का इतिहास पढ़ने में आनंद नहीं आता। इसके अधिकतर सुल्तान मुख्यत: भयंकर युद्धों में लगे रहे तथा इसकी आन्तरिक राजनीति दरबार के षड्यंत्र एवं गृह-युद्ध के कारण बुरी तरह विभ्रांत रही। इस वंश के अठारह सुल्तानों में पाँच की हत्या कर दी गयी, दो मद्यपान से मरे तथा तीन को गद्दी से उतार दिया गया, जिनमें दो नेत्रहीन बना दिए गए। पर बहमनी सुल्तानों को अपने दृष्टिकोण के अनुसार, विद्या एवं शिक्षा के संरक्षण, दुर्गों एवं भवनों के निर्माण तथा पूर्वी प्रान्तों में नहरों की खुदाई का श्रेय प्राप्त है। नहरों के खोदे जाने से किसानों को लाभ हुआ तथा राज्य को अधिक राजस्व प्राप्त हुआ।
बहमनी राज्य में जनसाधारण की दशा की एक झाँकी हमें रूसी यात्री अल्थनेसियस निकितिन के लेख में मिलती है। उसने मुहम्मद शाह तृतीय के शासनकाल में 1470 से 1474 के बीच इस राज्य में भ्रमण किया था। वह लिखता है कि सुल्तान, बीस वर्षों का छोटा मनुष्य सरदारों के वश में है.... सुल्तान अपनी सेना के तीन लाख मनुष्यों के साथ बाहर जाता है। देश लोगों से भरा हुआ है। पर गाँवों के लोग बहुत दयनीय हैं, जबकि सरदार अत्यन्त धनी है तथा विषयसुख में उल्लासित होते हैं। चाँदी के बिछवनों पर सोये जाने के अभ्यस्त हैं, जिनके आगे सोने में सजाये गये लगभग बीस जंगी घोडे तथा पीछे तीन सौ घुड़सवार, पाँच सौ पैदल, बाजे वाले, दस मशालची और दस गवैये चलते हैं। सुल्तान अपनी माँ तथा अपनी बीवी के साथ शिकार खेलने जाता है। उस समय उसके साथ दस हजार अश्वारोही और पचास हजार पैदलों का क्रमबद्ध समूह होता है। चमकदार शस्त्रों से सुसज्जित दो सौ हाथी भी होते हैं। आगे सौ अश्वारोही, सौ नर्त्तक, स्वर्ण वस्त्रों में तीन सौ साधारण घोडे, सौ बन्दर और सौ विदेशी रखेलियाँ रहती हैं।
इस प्रकार एक विदेशी यात्री का परमन हमें बताता है की सरदारों के रहने के विलासपूर्ण स्तर की तुलना में साधारण मनुष्यों का जीवन कठिन था। पर कोई भी दूसरा स्पष्ट परमन नहीं है, जिससे हम सम्पूर्ण बहमनी-काल में जनसाधारण की दशा का ठीक-थक चित्र पा सकें। मुस्लिम इतिहासकारों के विवरण सैनिक आक्रमणों तथा अधर्मियों (काफिरों, के विरुद्ध लड़ाइयों के सम्बन्ध) के वर्णनों से पूर्ण हैं, पर उनमें लोगों के इतिहास के विषय में कोई संकेत नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र संघ United Nations Organisation - UNO

स्थापना
संयुक्त राष्ट्र संघ एक अंतरराष्ट्रीय अंतरसरकारी संगठन के निर्माण का विश्व का दूसरा प्रयास था। राष्ट्र संघ की असफलता ने एक ऐसे नये संगठन की स्थापना के विचार को जन्म दिया, जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक समतापूर्ण व न्यायोचित बनाने में केन्द्रीय भूमिका अदा कर सके। यह विचार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उभरा तथा 5 राष्ट्रमंडल सदस्यों तथा 8 यूरोपीय निर्वासित सरकारों द्वारा 12 जून, 1941 को लंदन में हस्ताक्षरित अंतर-मैत्री उद्घोषणा में पहली बार सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त हुआ। इस उद्घोषणा के अंतर्गत एक स्वतंत्र विश्व के निर्माण हेतु कार्य करने का आह्वान किया गया, जिसमें लोग शांति व सुरक्षा के साथ रह सकें।
इस घोषणा के उपरांत अटलांटिक चार्टर (14 अगस्त, 1941) पर हस्ताक्षर किये गये। इस चार्टर को संयुक्त राष्ट्र के जन्म का सूचक माना जाता है। इस चार्टर पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल तथा अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट द्वारा अटलांटिक महासागर में मौजूद एक  युद्धपोत पर हस्ताक्षर किये गये थे। अटलांटिक चार्टर ने एक ऐसे विश्व की आशा को अभिव्यक्त किया, जहां सभी लोग भयमुक्त वातावरण में रह सकें तथा निजीकरण एवं आर्थिक सहयोग के मार्ग की खोज कर सकें।
1 जनवरी, 1942 की वाशिंगटन में अटलांटिक चार्टर का समर्थन करने वाले 26 देशों ने संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पर हस्ताक्षर किये। यहां पहली बार राष्ट्रपति रूजवेल्ट द्वारा अभिकल्पित नाम संयुक्त राष्ट्र का प्रयोग किया गया।
इंग्लैंड, चीन, सोवियत संघ तथा अमेरिका द्वारा 30 अक्टूबर, 1943 को सामान्य सुरक्षा से सम्बंधित मास्को घोषणा पर हस्ताक्षर किये गये। यह घोषणा भी शांति बनाये रखने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के विचार का अनुमोदन करती थी। नवंबर-दिसंबर 1943 में अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्टब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल तथा सोवियत संघ के प्रधान (Premier) स्टालिन ने तेहरान में मुलाकात की तथा संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना हेतु विभिन्न योजनाओं पर विचार-विमर्श किया। यह द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मुख्य मित्र राष्ट्र नेताओं की प्रथम बैठक थी।
1944 में अगस्त से अक्टूबर तक सोवियत संघ, अमेरिका, चीन तथा ब्रिटेन के प्रतिनिधियों द्वारा वाशिंगटन के डम्बर्टन ओक्स एस्टेट में कई बैठकें आयोजित की गयीं, जिनका उद्देश्य एक शांतिरक्षक संगठन की योजना बनाना था। वे एक प्राथमिक योजना का खाका खींचने में सफल हुए। 7 अक्टूबर, 1944 को संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावित ढांचे को प्रकाशित किया गया। इन प्रस्तावों पर आगे चलकर याल्टा सम्मेलन (फरवरी 1945) में विचार-विमर्श किया गया, जहां सोवियत संघ, अमेरिका एवं ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक हुई थी। अंत में, अंतरराष्ट्रीय संगठन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में 50 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। 25 अप्रैल, 1945 को सेन फ्रांसिस्को में आयोजित इस सम्मेलन को सभी सम्मेलनों की समाप्ति करने वाला सम्मेलन माना जाता है। जहां नये संगठन का संविधान तैयार किया गया। 26 जून, 1945 की सभी 50 देशों ने चार्टर पर हस्ताक्षर किये। पोलैंड सम्मेलन में हिस्सा नहीं ले सका था किंतु थोड़े समय बाद चार्टर पर हस्ताक्षर करके वह भी संस्थापक सदस्यों की सूची में शामिल हो गया। लिखित अनुमोदनों की अपेक्षित संख्या अमेरिकी विदेश विभाग में जमा हो जाने के बाद 24 अक्टूबर, 1945 से चार्टर प्रभावी हो गया। 31 दिसंबर, 1945 तक सभी हस्ताक्षरकर्ता देश चार्टर का अनुमोदन कर चुके थे।
24 अक्टूबर को प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में मनाया जाता हैमुख्यालय
संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय न्यूयार्क में है। 14 दिसंबर, 1946 को संयुक्त राष्ट्र ने अपना मुख्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका में रखने के पक्ष में मतदान किया। न्यूयार्क में ईस्ट नदी (East River) के किनारे सात हेक्टेयर भूमि खरीदने के लिए अमेरिका के जॉन डी. रॉकफेलर जूनियर ने 85 लाख डॉलर की रकम दान में दी। नगर प्रशासन द्वारा भी उस क्षेत्र में कुछ अतिरिक्त भूमि उपलब्ध करायी गयी। संगठन की इमारत 1952 में बनकर तैयार हुई। न्यूयार्क के लांग आईलैंड में लेक सक्सेस पर अस्थायी मुख्यालय बनाया गया था। 10 जनवरी, 1946 को लंदन में महासभा का प्रथम सत्र आयोजित हुआ था।
ध्वज
संयुक्त राष्ट्र के ध्वज को 1947 में आधिकारिक प्रतीक के रूप में अंगीकृत किया गया। ध्वज में हल्के नीले रंग की पृष्ठभूमि के अंतर्गत सफेद रंग से विश्व के वृत्ताकार मानचित्र (जैसाकि उत्तरी ध्रुव से दिखाई देता है) को दर्शाया गया है, जो जैतून की शाखाओं के हार द्वारा घिरा हुआ है। जैतून की शाखाएं शांति का प्रतीक हैं।
राष्ट्र संघ
राष्ट्र संघ, संयुक्त राष्ट्र संघ से पूर्व संगठन, देशों का अंतरराष्ट्रीय संगठन था जिसने 1920 और 1946 के बीच कार्य किया। प्रथम विश्व युद्ध और वर्साय की संधि इसके निर्माण के तुरंत उत्प्रेरक थे। विश्व युद्ध के विध्वंस को देखते हुए यह विश्व के नेताओं, विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, ने एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की जो विभिन्न राष्ट्रों के बीच शांति बनाए रख सके। विल्सन का विश्वास था कि अंतरराष्ट्रीय अराजकता, शक्ति संतुलन और स्व-सहायता की अवधारणाओं के परिप्रेक्ष्य में, विश्व युद्ध निरंतर होते रहेंगे, और जब तक प्रत्येक राष्ट्र को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहना होगा। ऐसी स्थिति में राष्ट्र प्रतिस्पर्धी समूह बनाएंगे, एक-दूसरे के विरुद्ध रक्षात्मक उपाय के तौर पर स्वयं की रक्षा उपकरणों से सुसज्जित करेंगे। अपने प्रसिद्ध 14 बिंदुओं के भाषण में राष्ट्रपति ने राष्ट्रों का एक सामान्य संघ बनाने का निवेदन किया जो छोटे और बड़े दोनों राष्ट्रों को एकसमान राजनीतिक स्वतंत्रता एवं क्षेत्रीय अखण्डता की परस्पर गारंटी दे सके। यह सामूहिक सुरक्षा का तंत्र होगा। यह 14 बिंदु राष्ट्र संघ के निर्माण का आधार बने।प्रथम विश्व युद्ध के विजेताओं- फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, इटली, जापान एवं अमेरिका - ने राष्ट्र संघ के लिए 1919 में एक संविधान तैयार किया। संविधान में ऐसे अनुच्छेद हैं जो सदस्य राष्ट्रों को सभी सदस्यों की युद्ध से रक्षा एवं उनकी स्वतंत्रता तथा क्षेत्रीय अक्षुण्णता का संरक्षण करने की शपथ दिलाते हैं। राष्ट्र संघ का औपचारिक रूप से गठन जनवरी 1920 में किया गया और इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में बनाया गया। इसकी स्थापना के समय इसमें 42 सदस्य राष्ट्र थे।राष्ट्र संघ के तीन मुख्य अंग थे- परिषद्, सभा एवं सचिवालय। परिषद् मुख्य शांति रक्षण अभिकरण थी।

राष्ट्र संघ के इतिह्रास में इसका आकार 8 से 14 सदस्यों के अनुसार परिवर्तित होता रहा। राष्ट्र संघ के सर्वाधिक शक्तिशाली सदस्यों की स्थायी सदस्यता प्राप्त थी। स्थायी सदस्यता प्राप्त देशों में समय-समय पर परिवर्तन होता रहा, लेकिन ग्रेट ब्रिटेन, इटली, सोवियत संघ, फ्रांस, जापान एवं जर्मनी की स्थायी सदस्यता बनी रही जब तक वे संघ में बने रहे। अन्य सदस्य तीन वर्षों के लिए चुने जाते थे परिषद् की वर्ष में तीन बार बैठक होती थी। विशेष प्रकार के राजनीतिक विवादों से निपटने का काम परिषद् का था।सभा में सभी सदस्य राष्ट्र होते थे, और प्रत्येक सदस्य का एक वोट होता था। इसके कार्यों में सामान्य नीति का निर्णय, राष्ट्र संघ के बजट का नियंत्रण, नए सदस्यों को शामिल करना, अस्थायी परिषद् सदस्यों का चुनाव और संविधान में संशोधन करना, शामिल थे। इसकी बैठक वार्षिक होती थी ।सचिवालय, पेपर वर्क देखता था, एजेंडा तैयार करना, प्रस्तावों को लिखना तथा लीग के निर्णयों पर रिपोर्ट तैयार करना जैसे कार्य इसके अंतर्गत थे। महासचिव इसका प्रमुख होता था, जिसे परिषद् द्वारा पद्नामित एवं सभा द्वारा अनुमोदन प्राप्त होता था।राष्ट्र संघ 1946 में समाप्त कर दिया गया। लेकिन देशों के बीच संबंधों के सुधार में इसके प्रयास को सराहा जाता रहा। इसने विभिन्न मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने में भी सफलता प्राप्त की। इसकी कई समितियों एवं आयोगों ने उल्लेखनीय परिणाम हासिल किए।

राष्ट्र संघ की एक बेहद सफलता अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना करना था, जिसने सफलतापूर्वक बड़ी एवं वृहद् मात्रा में सूचना संग्रहण एवं प्रकाशन किया और अधिकतर सरकारें अधिकतम कार्य के घंटे, दिन एवं सप्ताह के निर्धारण, पर्याप्त न्यूनतम मजदूरी, बीमारी एवं बेरोजगारी, लाभ, वृद्धावस्था पेंशन इत्यादि के निर्धारण पर कदम उठाने के लिए इस पर निर्भर रहते थे।1920 के दशक के पूर्वार्द्ध में कई राजनीतिक विवाद लीग को सौंपे गए और इसके निर्णयों को स्वीकारा गया। हालांकि, इनमें से कोई भी विवाद इतना गंभीर नहीं था कि वह वैश्विक शांति के लिए खतरा बन सके, और न ही लीग के निर्णय प्रमुख बड़े राज्यों के विरुद्ध थे जो इसके निर्णयों को चुनौती दे सकते थे।

यद्यपि राष्ट्र संघ को कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं हुई, तथापि यह बात भी सत्य है कि इसके आने से अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विकास में एक बड़ा एवं आमूल-चूल कदम उठाया गया।
भाषाएं
संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में अरबीचीनी, फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी तथा स्पेनिश शामिल हैं। अरबी को छोड़कर शेष सभी कार्यकारी भाषाएं हैं।
उद्देश्य, लक्ष्य एवं सिद्धांत
संयुक्त राष्ट्र चार्टर ही संगठन का संविधान है। इसमें कुल 19 अध्याय हैं, जिन्हें 111 अनुच्छेदों में विभाजित किया गया है, जो संगठन के लक्ष्यों, सिद्धांतों तथा कार्यपद्धतियों को विश्लेषित करते हैं।
चार्टर की प्रस्तावना में संयुक्त राष्ट्र के चार मुख्य उद्देश्यों को रेखांकित किया गया है, जो इस प्रकार हैं-
  1. आगामी पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाना।
  2. मूलभूत मानवाधिकारों, मानवीय गरिमा व कार्यो, महिलाओं, पुरुषों व राष्ट्रों के समान अधिकारों में निष्ठा को पुनर्स्थापित करना।
  3. ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करना, जिनमें न्याय तथा संधियों या अन्य अंतरराष्ट्रीय कानूनी स्रोतों से उत्पन्न प्रतिबद्धताओं के प्रति सम्मान को कायम रखा जा सके।
  4. व्यापकतर स्वतंत्रता के अंतर्गत सामाजिक उन्नति एवं बेहतर जीवन स्तर को संवर्धित करना !
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 1 में इसके लक्ष्यों का निर्धारण किया गया है, जो निम्नलिखित हैं-
  1. अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा कायम रखना।
  2. राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बंधों का विकास करना।
  3. आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रकृति की समस्याओं को सुलझाने में सम्मान को प्रोत्साहित व संवर्द्धित करना।
  4. उपर्युक्त लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु राष्ट्रों की कार्यवाहियों के सामंजस्य केन्द्र के रूप में कार्य करना।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर की प्रस्तावना
लगभग 200 शब्दों की प्रस्तावना चार्टर के अध्यायों की भूमिका बताती है तथा संगठन की मार्ग-दर्शक भावना को अभिव्यक्त करती है। दक्षिण अफ्रीका के जान क्रिश्चियन स्मट्स को प्रस्तावना की रूपरेखा तैयार करने का श्रेय प्राप्त है। पूर्ण प्रस्तावना उद्धृत करती है कि-“हम संयुक्त राष्ट्र के लोग प्रतिबद्ध हैं आगामी पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका, जो हमारे जीवनकाल में दो बार मानव जाति को अकथनीय दुःख पहुंचा चुकी है, से बचाने के लिए, तथामूलभूत मानवाधिकारों, मानवीय प्रतिष्ठा, स्त्री पुरुष और छोटे-बड़े राष्ट्रों के समान अधिकारों में निष्ठा को पुनर्स्थापित करने के लिए, तथाऐसी परिस्थितियों की स्थापना के लिए, जिनके अंतर्गत संधियों व अंतरराष्ट्रीय विधि के अन्य स्रोतों से उपजी प्रतिबद्धताओं के प्रति सम्मान एवं न्याय को कायम रखा जा सके, तथाव्यापक स्वतंत्रता के वातावरण में सामाजिक उन्नति और बेहतर जीवन स्तरों को प्रोत्साहित करने के लिए,और इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा कायम रखने हेतु अपनी शक्ति को संगठित करने के लिए, तथा प्रणालियों की संस्था एवं सिद्धांतों के स्वीकरण द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए कि सशस्त्र बल का उपयोग सर्वहित को बचाने में ही किया जाए, तथा

सभी लोगों की समाजार्थिक उन्नति को प्रोत्साहन देने हेतु एन अंतर्राष्ट्रीय कार्यतंत्र की स्थापना के लिए,

अपने प्रयासों को संयुक्त करके इन उद्देश्यों की पूर्ति करने का संकल्प करते हैं।

हमारी सरकारें, जो अच्छे एवं अपेक्षित रूप में अपनी पूर्ण शक्तियों का प्रदर्शन कर चुकी हैं, सैन फ्रांसिस्को में एकत्रित अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र के वर्तमान चार्टर पर सहमत हुई हैं और इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र के रूप में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना करती हैं।”
चार्टर के अनुच्छेद 2 में संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों की पूर्ति हेतु निम्नलिखित सिद्धांतों को अपरिहार्य माना गया है-
  1. संगठन सभी सदस्यों की प्रभुसत्तात्मक समानता के सिद्धांत पर आधारित हो।
  2. सभी सदस्य चार्टर के अधीन ग्रहण की गयी प्रतिबद्धताओं का पालन सद्निष्ठा के साथ करें।
  3. सभी सदस्य अपने अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण साधनों के द्वारा ही करें।
  4. सभी सदस्य अपने अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों में शक्ति के प्रयोग या धमकी से परहेज रखें।
  5. वे संयुक्त राष्ट्र द्वारा चार्टर के अनुरूप की जाने वाली किसी भी कार्यवाही में हर प्रकार की सहायता प्रदान करें तथा ऐसे किसी भी राज्य की सहायता न दें, जिसके विरुद्ध संगठन द्वारा निवारक या दंडात्मक कार्यवाही की जा रही हो।
  6. संयुक्त राष्ट्र द्वारा यह भी सुनिश्चित किया गया है कि गैर-सदस्य राष्ट्र भी उस सीमा तक इन सिद्धांतों का पालन करें, जहां तक कि अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा बनाये रखने की दृष्टि से यह अनिवार्य होता हो।
  7. संगठन द्वारा किसी राज्य के घरेलू मामलों में अनिवार्य रूप से हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा। फिर भी, यह प्रावधान शांति के उल्लंघन, शांति के लिए पैदा खतरे या आक्रमण अनुप्रयोग पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।
सदस्यता वर्ष 2015 के मध्य तक संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की संख्या 193 थी। संस्थापक सदस्यों की संख्या 51 है, जबकि अन्य सदस्यों को चार्टर के अनुच्छेद 4 के अंतर्गत सुरक्षा परिषद की अनुशंसा पर महासभा द्वारा निर्वाचित किया जाता है।
संगठन की सदस्यता उन सभी शांतिप्रिय राज्यों के लिए खुली हुई है, जो चार्टर द्वारा अपेक्षित कर्तव्यों को वहन करने की इच्छा और सामर्थ्य रखते हैं। नये सदस्य को संगठन में प्रवेश पाने के लिए सुरक्षा परिषद के कम-से-कम नौ सदस्यों (पांच स्थायी सदस्यों सहित) के सकारात्मक मत तथा महासभा के दो-तिहाई बहुमत के समर्थन की आवश्यकता होती है।
चार्टर का उल्लंघन करने वाले सदस्य राष्ट्र की निलंबित या निष्कासित किया जा सकता है किंतु अभी तक इस प्रकार की कोई कार्यवाही अस्तित्व में नहीं आयी है। ताइवान तथा वेटिकन सिटी राज्य संयुक्त राष्ट्र के सदस्य नहीं हैं। इस प्रकार, संगठन की सार्वभौमिकता का लक्ष्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है।
मुख्य अंग
चार्टर में संयुक्त राष्ट्र के छह अंगों की स्थापना का प्रावधान है, जिनमें महासभा, सुरक्षा परिषद्, आर्थिक और सामाजिक परिषद्, न्यास परिषद्, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तथा सचिवालय शामिल हैं।
सहायक अंग
इसके अतिरिक्त विशिष्ट मामलों से निपटने के लिए सहायक या तदर्थ निकायों का गठन भी किया जाता है। इनमें शांतिरक्षण अभियानों पर विशेष समिति, मानवाधिकारों पर आयोग, निरस्त्रीकरण सम्मेलन, अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग, बाह्यतर अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर समिति, नाभिकीय विकिरण के प्रभावों पर वैज्ञानिक समिति, फिलीस्तिनियों के लिए समाधान आयोग, उपनिवेशों को स्वतंत्रता प्रदान करने की घोषणा के क्रियान्वयन पर विशेष समिति, दक्षिण अफ्रीकी सरकार की रंगभेद की नीतियों पर विशेष समिति इत्यादि।
महासभा के सहायक अंगों की समितियों, आयोगों, बोर्डों, परिषदों और पैनल तथा कार्यकारी समूहों एवं अन्य में विभाजित किया जाता है। एजेंडा के मदों पर विचार करने के पश्चात्, जहां संभव हो राज्यों की विभिन्न तरीकों में समन्वय करना, सहायक अंग अपनी अनुशंसाए प्रस्तुत करते हैं, यह सामान्यतः ड्राफ्ट्र प्रस्तावों के और निर्णयों के रूप में होता है, जिससे सभा में इस पर विचार हो सके। .
महासभा
महासभा एकमात्र ऐसा प्रमुख दीर्घ अंग है, जिसमे संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों का प्रतिनिधित्व होता है। इसे विश्व की नगर बैठक भी कहा जाता है। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र पांच प्रतिनिधियों को महासभा में भेज सकता है किंतु उनका मत एक ही माना जाता है। महासभा द्वारा प्रत्येक वार्षिक सत्र के आरंभ में एक नये अध्यक्ष, 21 उपाध्यक्षों तथा 7 मुख्य समितियों के अध्यक्षों का निर्वाचन किया जाता है। न्यायोचित भौगोलिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए महासभा की अध्यक्षता का भार प्रतिवर्ष चक्रानुक्रम आधार पर राष्ट्रों के 5 भौगोलिक समूहों (अफ्रीकी, एशियाई, पूर्वी यूरोपीय, लैटिन अमेरिकी, पश्चिमी यूरोपीय तथा अन्य राज्य) के मध्य सौंपा जाता है। अध्यक्ष का मुख्य कर्तव्य महासभा के विचार-विमशों को सही दिशा में आगे बढ़ाना तथा उसके कार्यो को निर्देशित करना है।
बैठकें
महासभा प्रतिवर्ष एक नियमित वार्षिक सत्र आयोजित करती है, जो 1 सितंबर के बाद आने वाले प्रथम मंगलवार की आरंभ होता है। विचार-विमर्श एवं वाद-विवाद सितंबर के तीसरे सप्ताह से आरंभ होते हैं और प्रायः मध्य दिसंबर तक जारी रहते हैं। सुरक्षा परिषद के विशेष आग्रह या सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के अनुरोध या बहुमत की सहमति प्राप्त सदस्य राष्ट्र के अनुरोध पर महासभा का विशेष सत्र आयोजित किया जा सकता है। समान तरीके द्वारा या सुरक्षा परिषद के 9 सदस्यों का मत समर्थन प्राप्त सुरक्षा परिषद के अनुरोध पर महासभा 24 घंटे के भीतर अपना आपातकालीन सत्र आयोजित कर सकती है।
मतदान
महासभा में मतदान हेतु प्रस्तुत अधिकांश प्रश्नों का निर्णय साधारण बहुमत द्वारा किया जाता है। कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के सम्बंध में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इनमें शांति व सुरक्षा सम्बंधी मुद्दे, नये सदस्यों का चुनाव तथा बजट इत्यादि शामिल हैं।
शक्तियां
महासभा संयुक्त राष्ट्र के प्रत्येक अंग के प्रति कुछ-न-कुछ उत्तरदायित्व रखती है। यह अन्य प्रमुख अंगों के सदस्यों का चुनाव करती है, जैसे-सुरक्षा परिषद के दस अस्थायी सदस्य, आर्थिक व सामाजिक परिषद के 54 सदस्य, न्यास परिषद के निर्वाचित सदस्य इत्यादि। यह सुरक्षा परिषद के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों का चुनाव करती है। महासभा द्वारा सुरक्षा परिषद की अनुशंसा पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की नियुक्ति की जाती है। इसे नये सदस्यों को संगठन में प्रवेश देने की शक्ति प्राप्त है। महासभा संयुक्त राष्ट्र के बजट को स्वीकृति देती है, संगठन के खचों को सदस्यों के बीच बांटती है तथा अन्य दूसरे अंगों से रिपोटें प्राप्त करके उन पर विचार-विमर्श करती है। इसे सहायक अंगों एवं तदर्थ समितियों की स्थापना करने की शक्ति भी प्राप्त है। यह संयुक्त राष्ट्र से सम्बंध रखने वाले किसी भी प्रश्न पर विचार कर सकती है। जब सदस्यों में मतैक्य के अभाव के कारण सुरक्षा परिषद शांति के उल्लंघन या आक्रमण की कार्यवाही की स्थिति में अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी की निभा पाने में असमर्थ हो जाती है, तब महासभा उस मुद्दे पर विचार कर सकती है और शांतिपूर्ण एवं सुरक्षित अंतरराष्ट्रीय वातावरण की पुनर्स्थापना हेतु सामूहिक कार्यवाही का सुझाव दे सकती है। इस प्रकार शांतिरक्षण के सम्बंध में सुरक्षा परिषद के उत्तरदायित्वों को महासभा अनुपूरकता प्रदान करती है।
मुख्य समितियां
संयुक्त राष्ट्र चार्टर को अपने कार्य के निर्वहन हेतु जरुरी समितियां स्थापित करने का अधिकार दिया गया है। छह मुख्य समितियों में सभी सदस्य राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व होता है। ये समितियां हैं-
  • प्रथम समिति (निरस्त्रीकरण एवं अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित);
  • द्वितीय समिति (आर्थिक एवं वितीय);
  • तृतीय समिति (सामाजिक, मानवीय तथा सांस्कृतिक);
  • चतुर्थ समिति (विशेष राजनीतिक एवं विऔपनिवेशीकरण);
  • पंचम समिति (प्रशासक एवं बजटीय), तथा;
  • षष्टम समिति (वैधानिक)।
प्रत्येक समिति अपने से जुड़े विषयों पर सौंपे गये मामलों का अध्ययन करती है तथा महासभा के पास अपनी सिफारिशें भेजती है।
28 सदस्यीय सामान्य समिति (General Committee) द्वारा महासभा एवं उसकी समितियों की कार्यवाहियों में समन्वय किया जाता है। दो स्थायी समितियां भी कार्य करती हैं-
प्रथम, 16 सदस्यीय परामर्शदात्री समिति, जो प्रशासनिक एवं बजटीय प्रश्नों से सम्बद्ध है;
द्वितीय, 18 सदस्यीय योगदान समिति जो (Committee on Contributions) संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों द्वारा किए जाने वाले भुगतान का निर्धारण करने के सम्बंध में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करती है।
भारत और संयुक्त राष्ट्र
भारत, संयुक्त राष्ट्र के उन प्रारंभिक सदस्यों में शामिल था जिन्होंने 01 जनवरी, 1942 को वाशिंग्टन में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे तथा 25 अप्रैल से 26 जून, 1945 तक सेन फ्रांसिस्को में ऐतिहासिक संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय संगठन सम्मेलन में भी भाग लिया था। संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत, संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पुरजोर समर्थन करता है और चार्टर के उद्देश्यों को लागू करने तथा संयुक्त राष्ट्र के विशिष्ट कार्यक्रमों और एजेंसियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोणः राजनीतिक स्वतंत्रता और रंगभेद
स्वतंत्र भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी सदस्यता को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने की एक महत्वपूर्ण गारंटी के रूप में देखा। भारत, संयुक्त राष्ट्र के उपनिवेशवाद और रंगभेद के विरूद्ध संघर्ष के अशांत दौर में सबसे आगे रहा। भारत औपनिवेशिक देशों और कौमों को आजादी दिए जाने के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक घोषणा 1960 का सह-प्रायोजक था जो उपनिवेशवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों को बिना शर्त समाप्त किए जाने की आवश्यकता की घोषणा करती है। भारत राजनीतिक स्वतंत्रता समिति (24 की समिति) का पहला अध्यक्ष भी निर्वाचित हुआ था जहां उपनिवेशवाद की समाप्ति के लिए उसके अनवरत प्रयास रिकार्ड पर हैं।
भारत, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और नस्लीय भेदभाव के सर्वाधिक मुखर आलोचकों में से था। वस्तुतः भारत संयुक्त राष्ट्र (1946 में) में इस मुद्दे को उठाने वाला पहला देश था और रंगभेद के विरूद्ध आम सभा द्वारा स्थापित उप समिति के गठन में अग्रणी भूमिका निभाई थी। जब 1965 में सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन से संबंधित कन्वेंशन पारित किया गया था, भारत सबसे पहले हस्ताक्षर करने वालों में शामिल था।
गुट निरपेक्ष आंदोलन और समूह-77 के संस्थापक सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में भारत की हैसियत, विकासशील देशों के सरोकारों और आकांक्षाओं तथा अधिकाधिक न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना के अग्रणी समर्थक के रूप में मजबूत हुई।
समकालीन प्राथमिकताएं: संयुक्त राष्ट्र सुधार, सतत् विकास, आतंकवादरोध एवं निरस्त्रीकरण
भारत को दृढ़ विश्वास है कि सयुंक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के आदर्श जिसका उसने पोषण किया है, आज की वैश्विक चुनौतियों का मुकाबला करने के सर्वाधिक प्रभावी साधन बने हुए हैं। भारत, हमारे सामने आ रही सभी समस्याओं के व्यापक और न्यायोचित समाधान के लिए बहुपक्षवाद की भावना से राष्ट्रों की समिति के साथ कार्य करने के अपने प्रयासों में अडिग है। इन समस्याओं में विकास और गरीबी उन्मूलन, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, समुद्री डकैती, निरस्त्रीकरण, शांति स्थापना और मानवाधिकार शामिल हैं।
भारत यह सुनिश्चित करने के लिए समान विचारधारा वाले देशों के साथ सहयोग कर रहा है कि सतत् विकास पर चर्चा गरीबी उन्मूलन पर केंद्रित रहे और कि 2015 के पश्चात विकास की कार्यसूची को मूर्त रूप प्रदान करने से संबंधित वैश्विक संवाद में आरआईओ सिद्धांत अटल रहें। भारत समान और साझा किंतु अलग-अलग जिम्मेदारी के सिद्धांतों के आधार पर एक व्यापक, न्यायोचित और संतुलित परिणाम के जरिए जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत सभी प्रकार के आतंकवाद के प्रति 'पूर्ण असहिष्णुता' के दृष्टिकोण का समर्थन करता रहा है। आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक कानूनी रूपरेखा प्रदान करने के उद्देश्य से भारत ने 1996 में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के संबंध में व्यापक कन्वेंशन का मसौदा तैयार करने की पहल की थी और उसे शीघ्र अति शीघ्र पारित किए जाने के लिए कार्य कर रहा है।
शांति स्थापना और निरस्त्रीकरण, संयुक्त राष्ट्र के अत्यधिक विशेष प्रयासों में शामिल है क्योंकि वे इस दुनिया को बेहतर स्थान बनाने के लिए संगठन के आश्वासन और सहज संभावना को साकार करते हैं। 43 शांति स्थापना अभियानों में भागीदारी के साथ भारत का संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना अभियानों में भागीदारी का गौरवशाली इतिहास रहा है और यह 1950 के दशक से ही इन अभियानों में शामिल होता रहा है।
भारत, परमाणु हथियारों से संपन्न एक मात्र ऐसा राष्ट्र है जो परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने और उन्हें समाप्त करने के लिए परमाणु अस्त्र कन्वेंशन की स्पष्ट रूप से मांग करता रहा है। भारत समयबद्ध, सार्वभौमिक, निष्पक्ष, चरणबद्ध और सत्यापन योग्य रूप में परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है जैसा कि सन् 1998 में आम सभाके निरस्त्रीकरण से संबंधित विशेष अधिवेशन में पेश की गई राजीव गांधी कार्य योजना में प्रतिबिम्बित होता है।

Famous Personalities of Indian Freedom Movement 8

मोहम्मद इक़बाल 1873-1938
  • मोहम्मद इक़बाल उर्दू एवं फारसी के महान कवि और दार्शनिक थे।
  • उन्होंने नया शिवालातराने हिंद तथा हिमालय नामक देश भक्तिपूर्ण गीतों की रचना की थी।
  • परन्तु उनकी बेहतरीन रचनाएं बाल-ए-जिब्रेल (उर्दू) तथा रामुज-बेखुदी (पारसी) एवं जावेदनामा (पारसी) हैं।
  • उन्होंने नौजवानों को कर्म तथा आत्मविश्वास बनाने की बात पर बल दिया।
  • उनका भी सपना एक इस्लामी राज्य की स्थापना करना था किन्तु वह जिन्ना की सोच से काफी भिन्न था।
राना महेंद्र प्रताप 1886-1964
  • राना महेंद्र प्रताप एक राज परिवार से संबंधित युवक थे तथा देश की आजादी के लिए उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन किया।
  • 1915 में उन्होंने आजाद भारत की अस्थाई सरकार का निर्माण किया।
  • उन्होंने तकनीकी या प्रौद्योगिक शिक्षा का समर्थन किया।
  • उन्होंने वृंदावन में प्रेम विद्यालय की स्थापना की।
  • उन्होंने दो अखबारों प्रेम (हिंदी) तथा निर्मल सेवक (हिंदी-उर्दू) का प्रकाशन भी किया।
गणेश वासुदेव मावलकर 1888-1956
  • गणेश वासुदेव मावलंकर बैरिस्टर का कार्य छोड़ असहयोग आंदोलन में भाग लेकर राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित हुए।
  • उन्होंने सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलनों में भाग लिया तथा गिरफ्तार भी हुए व जेल में रहे।
  • उन्होंने बंबई लेजिस्लेटिव असेम्बली में स्पीकर का पदभार संभाला तथा अहमदाबाद म्यूनिसिपैलिटि के सभापति रहे।
  • गणेश वासुदेव मावलंकर स्वतंत्रता पश्चात् वे लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए।
ई. वी. रामास्वामी नायकर 1879-1973
  • वह पेरियार के नाम से भी प्रसिद्ध हुए। वह एक महान समाज-सुधारक थे, जिन्होंने दलित जातियों के उत्थान के लिए कार्य किया।
  • उन्होंने ब्राह्मणवादी ग्रंथों जैसे- मनु स्मृति को नकार दिया और दलित जातियों के लिए सेल्फ रेसपेक्ट आंदोलन शुरू किया।
  • उन्होंने गांधी जी के सामाजिक समता विचारों से भी विरोध जताया। कुदी अरसू नामक पत्रिका के लेखों द्वारा वह दलित जातियों में समानता तथा सम्मान के लिए जागृति जगाने के लिए लेख भी लिखते रहे।
  • उन्होंने द्रविड़ मुनेत्र कषगम की स्थापना की तथा दक्षिण में हिंदी थोपने का भारी विरोध किया।
पट्टाभि सीतारमैया 1940-1954
  • पट्टाभि सीतारमैया पेशे से एक डाक्टर थे, उन्होंने 1916 में कांग्रेस में शामिल होकर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी तथा कांग्रेस कार्यकारिणी समिति के भी सदस्य रहे।
  • वह कांग्रेस के कार्यकारी इतिहासकार भी रहे।
  • कांग्रेस के विचारों को फैलाने के लिए उन्होंने अंग्रेजी पत्रिका, जन्मभूमि का भी संपादन किया।
  • वह 1939 के कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार बने परन्तु सुभाष चंद्र बोस से वह हार गए।
  • सन् 1948 में जयपुर अधिवेशन में वह कांग्रेस अध्यक्ष बने। 1952 में वह मध्य प्रदेश के गर्वनर रहे।
रास बिहारी बोस 1886-1945
  • रास बिहारी बोस का जन्म पलबिगती (बंगाल) में हुआ, वह एक क्रांतिकारी थे।
  • उन्होंने दिल्ली, यू.पी. तथा पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन का संचालन किया।
  • दिसम्बर 23, 1912 में दिल्ली के चांदनी चौक में गवर्नर-जनरल लार्ड हार्डिग के काफिले पर उन्होंने बम फेंका तथा उन्होंने और अधिक क्रांतिकारी आंदोलन को संचालन करने की योजना बनाई जो (प्रथम लाहौर षड़यंत्र केस के नाम से जाना गया) परन्तु उनकी योजना विफल रही तथा गिरफ्तारी से बचने के लिए सन् 1915 में वह जापान पलायन कर गये तथा वह एक भगोड़े के रूप में रहने लगे।
  • जापान में भी उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखीं। उन्होंने वहां इंडियन इंडिपेंडेंस लीग (पहले बैंकाक) की स्थापना की।
  • रास बिहारी बोस ने कैप्टन मोहन सिंह को युद्धबंदियों की सेना आजाद हिंद फौज का गठन करने में सहायता प्रदान की तथा सन् 1943 में सिंगापुर में उन्होंने, इंडियन इंडिपेंडेंस लीग, की कमान भारतीय नेता सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी।
गोपाल कृष्ण गोखले 1866-1915
  • उनका जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ। महात्मा गांधी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे
  • गोपाल कृष्ण गोखले की संस्था दक्कन सभा (1896) का उद्देश्य अकाल के दौरान मदद करना, प्लेग महामारी में सहायता करना, भूमि-सुधार कार्य तथा ग्रामीण स्वशासन की स्थापना करना था।
  • उन्होंने वेल्बी आयोग के सामने भारत में ब्रिटिश प्रशासन की आर्थिक तथा प्रशासनिक हालत की बुरी व्यवस्था पर गवाही दी थी।
  • भूमि बेदखली कानून पर उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी बैंक बनाने का सुझाव दिया तथा बेदखली की जमीन के एवज में बैंकों पर निर्भर होने का भी प्रस्ताव दिया।
  • वह कांग्रेस के बनारस अधिवेशन (1905) के अध्यक्ष बने। उसी दौरान स्वराज्य का प्रस्ताव भी पारित किया गया था।
  • उन्होंने सरवेंट ऑफ इंडिया सोसाईटी की स्थापना 1907 में की, जिसका उद्देश्य राष्ट्र की सेवा करना था।
  • वह भारत में प्रारंभिक शिक्षा के हिमायती थे इसके लिए उन्होंने लेजिस्लेटिव कौंसिल में प्रस्ताव भी पेश किया था। उन्होंने दि क्वार्टरली जनरल का भी संपादन किया।
लोकमान्य तिलक 1886-1920
  • इनका जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ। वह कांग्रेस की उग्रपंथी विचारधारा के नेता थे और प्रसिद्ध त्रिमूर्ति लाल-बाल-पाल के सदस्य थे।
  • सामाजिक तौर पर वह पुरानी विचारधारा को मानते थे। परन्तु राजनीतिक तौर पर वह अपने सभी सहयोगियों से काफी आगे थे।
  • उनका प्रमुख नारा था स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है मैं इसे लेकर रहूंगा
  • महाराष्ट्र में लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने के लिए उन्होंने शिवाजी तथा गणपति उत्सवों का अयोजन किया।
  • अप्रैल, 1916 में उन्होंने होम रूल लीग की स्थापना की, जिसका प्रभाव मध्य प्रांत, बरार तथा महाराष्ट्र में काफी अधिक रहा।
  • तिलक पश्चिमी शिक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राजनैतिक स्वतंत्रता तथा प्रेस की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते थे वह कांग्रेस का दुबारा से पुनर्निर्माण करना चाहते थे। उन्होंने मराठा (अंग्रेजी) केसरी (मराठी) पत्रिकाओं का सपांदन भी किया।
  • इसके अलावा गीता रहस्य नामक पुस्तक उनकी श्रेष्ठ कृति है, जिसमें उन्होंने गीता के ऊपर एक बहुत अच्छी व्याख्या लिखी है।
पी. आनंद चारलू 1843-1908
  • पी. आनंद चारलू पहले दक्षिण भारतीय थे, जिन्होंने राजनीतिक संस्था बनाई, वह 1884 की मद्रास महाजन सभा के निर्माता थे, जिसका मुख्य उद्देश्य था राजनीतिक जागृति कायम करना।
  • वह कांग्रेस के शुरुआती वर्षों के एक सदस्य थे तथा 1895 में इसके अध्यक्ष भी रहे।
  • 1903-5 से वह मद्रास लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य भी रहे।
देव प्रसाद गुप्ता
  • देव प्रसाद गुप्ता बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी थे।
  • उन्होंने चटगांव सशस्त्र विद्रोह में 18 अप्रैल 1923 में सूर्य सेन के साथ मिलकर भाग लिया।
  • इसके लिए उन्होंने 17 क्रांतिकारियों के संगठन को तैयार किया था।
  • ये गिरफ्तारी से बचने के लिए वह जलालाबाद की पहाड़ियों में जा छिपे थे।जयप्रकाश नारायण 1902-99
    • इनका जन्म पटना के निकट सीताबयीरा में हुआ। उन्हें लोकनायक के नाम से ख्याति प्राप्त हुई।
    • वह मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित थे तथा श्रमिकों दबे-कुचले वर्गों के लिए उन्होंने जीवन पर्यन्त कार्य किया।
    • जयप्रकाश नारायण जमींदारी प्रथा के उन्मूलन तथा भारी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के पक्षधर थे।
    • जवाहरलाल नेहरु के प्रभाव के कारण उन्होंने कांग्रेस में सम्मिलित होने का निर्णय लिया। उन्हें कांग्रेस के श्रमिक प्रभाग का कार्य उन्हें सौंपा गया।
    • कांग्रेस की समाजवादी विचारधारा को प्रभाव में लाने के लिए उन्होंने आचार्य नेरन्द्र देव के सहयोग से कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना की (1934)।
    • 1942 के आन्दोलन के दौरान उन्होंने गुप्त संस्था, आजाद दस्ता, का निर्माण कर भूमिगत आंदोलन चलाया।
    • आजादी के बाद उन्होंने विनोभा भावे के, भूदान आंदोलन, में भाग लिया तथा 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगायी गई आपातकाल के विरुद्ध जन-आन्दोलन चलाया तथा गिरफ्तारी दी।
    • उनकी प्रसिद्धि के कारण जनता पार्टी को 1977 के चुनावों में विजय प्राप्त हुई।
    मदन मोहन मालवीय 1861-1946
    • वह पेशे से एक वकील थे तथा उनका संबंध कांग्रेस तथा हिंदू महासभा से भी रहा। उन्होंने इलाहाबाद में यू.पी. औद्योगिक संघ की स्थापना की तथा बाद में भारतीय औद्योगिक संस्था बनाने में सहयोग दिया।
    • वह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापकों में से एक थे तथा बाद में इसके उप-कुलपति रहे।
    • उन्होंने नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना भी की तथा इंडियन यूनियनहिंदुस्तान, अभियानदया जैसे अखबारों का सपांदन भी किया।
    हकीम अजमल खान 1868-1927
    • वह विश्व प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सक थे। चिकित्सा-विज्ञान के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के कारण उन्हें हफीज उल मुल्क (1908) तथा कैसर-ए-हिंद (1915) सम्मानों से नवाजा गया।
    • वे उर्दू तथा फारसी भाषाओं में कविता, शैदा के उपनाम से करते थे।
    • उन्होंने मासिक पत्रिका, मुजाला-ए-तिब्बिया का भी प्रकाशन व संपादन किया।
    • उन्होंने 20वीं शती के शुरुआती वर्षों में राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया तथा कांग्रेस व मुस्लिम लीग की राजनीति में सक्रिय रहे तथा हिंदु-मुस्लिम एकता के लिए संघर्षरत रहे।
    • महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि हिंदु-मुस्लिम एकता तो उनकी सांसों में बसी हुई है।
    • उन्होंने दिल्ली में रोलेट सत्याग्रह तथा खिलाफ़त-असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया, इसी दौरान उन्होंने अली बंधुओं के साथ मिलकरअलीगढ़ में जामिया मिलिया की स्थापना की तथा जिसे बाद में दिल्ली लाया गया। उन्होंने दिल्ली में तिब्बिया विश्वविद्यालय भी स्थापित किया।
    कैलाश नाथकाटजू 1887-1969
    • कैलाश नाथकाटजू एक वकील थे तथा उन्होंने मेरठ षड़यंत्र केस के अभियुक्तों की पैरवी भी की थी (1933)।
    • यूनाइटेड प्रोविन्स के मंत्रालय में वह कांग्रेस के उद्योग, विकास, तथा न्याय मंत्री भी रहे।
    • उनका चयन संविधान-सभा के सदस्य के रूप में हुआ। वह केंद्रीय मत्रिमंडल में गृह मंत्री भी रहे तथा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने।
    लियाकत अली खान 1895-1951
    • लियाकत अली खान मुस्लिम लीग के महत्वपूर्ण नेता थे।
    • उन्होंने सन् 1944 में कांग्रेस के साथ समझौता वार्ता की थी। जो देसाई-लियाकत समझौता के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
    • 1946 में बनी अंतरिम सरकार में वह वित्त मंत्री थे उन्होंने अपने कार्यों से पटेल तथा नेहरू को काफी परेशान कर दिया था।
    • उसी कारण कांग्रेस के सदस्यों ने विभाजन करने का मन बनाया था।
    • विभाजन के बाद वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने तथा 1951 में रावलपिंडी में उनकी हत्या कर दी गई।
    रानी गेंदालुई 1815-81
    • रानी गेंदालुई नागा जनजाति से संबधित थीं तथा मणिपुर राज्य के नागा नेता जधोनाग की शिष्या थी।
    • जधोनाग ने मणिपुर को ब्रिटिश दासता से मुक्त करवाने के लिए राजनीतिक आन्दोलन चलाया। उन्हें मृत्यु दंड मिला था।
    • इसके पश्चात् रानी गेदांलुई ने आंदोलन का नेतृत्व किया परंतु 1932 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया तथा उनकी मुक्ति 1947 में स्वतंत्रता मिलने पर ही हुई।
    • जवाहरलाल नेहरु ने स्वर्ण अक्षरों में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए उन्हें ‘नागाओं की रानी' के नाम से सुशोभित किया।
    महादेव देसाई
    • इन्होंने 25 वर्षों तक गांधी जी के सचिव के रूप में कार्य किया।
    • उन्होंने चंपारन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक के सभी गांधीवादी आंदोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने इंडिपेंडेंट तथा नवजीवन का संपादन किया।
    • वह 1942 की गिरफ्तारी के दौरान पूना में गांधी जी के साथ जेल रहते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए।
    नारायण मल्हार जोशी 1975-1955
    • नारायण मल्हार जोशी जन्म महाराष्ट्र के कोलाबा में हुआ, उन्होंने सरवेन्टस ऑफ इंडिया सोसायाटी में कार्य किया।
    • 1912 में उन्होंने सोशल सर्विस लीग की स्थापना की।
    • वह श्रमिकों के उत्थान के लिए कार्य करते रहे। 1921 में उन्होंने ऑल इंडिया ट्रेड कांग्रेस में भाग लिया परन्तु 1931 में उन्होंने अलग नाम में ऑल इंडिया ट्रेड फेडरेशन बनाई।
    • वह अन्तराष्ट्रीय श्रम सगंठन की गवर्निग बॉडी के सदस्य बने तथा भारत सरकार पर श्रमिक कल्याण के लिए कानून बनाने पर दबाब डाला।
    • उन्होंने अनेकों औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की तथा कोपरोअटिव सोसाइटी की स्थापना की।
    कल्पना दत्त 1913-78
    • इन्होंने सूर्यसेन के साथ मिलकर प्रसिद्ध चटगांव शस्त्रागर हमले की योजना में भाग लिया था।
    • उन्हें भारत निर्वासन की सजा मिली। बाद में उन्होंने, कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की तथा श्रमिक वर्ग के उत्थान के लिए कार्य किया।
    फिरोज शाह मेहता 1911-1932
    • फिरोज शाह मेहता जन्म चटगांव बंगाल में हुआ।
    • ये प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन की सहयोगी बनी।
    • उन्होंने अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया, जिसमें सबसे प्रमुख था- 24 सितम्बर, 1932 में चटगांव में यूरोपीय क्लब पर हमला था।
    • गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने आत्महत्या कर ली।

THE UNIVERSE MODELS OF UNIVERSE

Geocentric Model   – The term “geocentric” means “earth–centered”. The geocentric model claimed that Earth was the center of the cosmos....